Sunday, April 22, 2012

Hausla


रख हौसला कि वो मंजर भी आएगा,
प्यासे के पास चल कर खुद समंदर भी आएगा,
थक के न बैठ ये मंजिल-अ-मसाफिर
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा !




Saturday, April 14, 2012

Main


 मजिल की तरफ मैं बढ़ता हूँ ,
कभी ठोकर खा कर गिरता हूँ !

खुद ही हिम्मत करके फिर ,
किसी तरह मैं उठता हूँ !

कहते हैं मुझको लोग ,
बहुत ही कम मैं बातें करता हूँ !

पर सच हैं अकेला हूँ सब मैं,
बस आहे भर के रहता हूँ !

कुछ बातें ऐसी होती है ,
जिनके कारण मैं डरता हूँ !

पर लोगो को विश्वास है ये ,
है सही मैं  जो भी करता हूँ !

है खुदा भी मुझसे रूठा सा,
मैं याद नहीं जो करता हूँ !