मजिल की तरफ मैं बढ़ता हूँ ,
कभी ठोकर खा कर गिरता हूँ !
खुद ही हिम्मत करके फिर ,
किसी तरह मैं उठता हूँ !
कहते हैं मुझको लोग ,
बहुत ही कम मैं बातें करता हूँ !
पर सच हैं अकेला हूँ सब मैं,
बस आहे भर के रहता हूँ !
कुछ बातें ऐसी होती है ,
जिनके कारण मैं डरता हूँ !
पर लोगो को विश्वास है ये ,
है सही मैं जो भी करता हूँ !
है खुदा भी मुझसे रूठा सा,
मैं याद नहीं जो करता हूँ !
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